DGIPR के अधिकारियों पर गंभीर आरोप — BNSS धारा 218 के तहत अभियोजन स्वीकृति की मांग, “बरसता तूफान” को भारी नुकसान का दावा
मुंबई, 31 जुलाई 2026 — महाराष्ट्र शासन के सूचना एवं जनसंपर्क महासंचालनालय (DGIPR) के कुछ अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध गंभीर आरोप सामने आए हैं। साप्ताहिक समाचारपत्र “बरसता तूफान” के संपादक इलियास अब्दुलमजीद खान ने इन अधिकारियों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृति (Sanction for Prosecution) प्रदान करने की औपचारिक मांग की है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, संपादक द्वारा दिनांक 20 अप्रैल 2026, 22 अप्रैल 2026 तथा 07 मई 2026 को संबंधित सक्षम प्राधिकरणों के समक्ष विस्तृत लिखित निवेदन प्रस्तुत किए गए थे। इन निवेदनों में DGIPR के कुछ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से पद का दुरुपयोग, नियमों एवं सरकारी प्रक्रियाओं का उल्लंघन, तथा अधिकारों का मनमाना प्रयोग किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, इन निवेदनों पर अब तक कोई ठोस या प्रभावी कार्रवाई नहीं किए जाने का भी आरोप है, जिसके चलते अब यह औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया गया है।
आवेदन में जिन अधिकारियों/कर्मचारियों के नाम प्रमुख रूप से उल्लेखित किए गए हैं, उनमें गणेश वसंतराव मुले, श्रीमती वर्षा संतोष आंधळे, श्रीमती नंदिनी शिवराज घाडगे, मिलिंद मधुकर दुसाने तथा अरुण पांडित्राव सूर्यवंशी सहित अन्य शामिल हैं। आवेदन के अनुसार, इन सभी ने अपने पद एवं अधिकारों का कथित रूप से दुरुपयोग करते हुए स्थापित नियमों, शासन के दिशा-निर्देशों तथा वैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है।
संपादक का दावा है कि इन कथित कृत्यों के परिणामस्वरूप साप्ताहिक “बरसता तूफान” को गंभीर प्रतिष्ठात्मक क्षति (Reputational Damage) के साथ-साथ आर्थिक नुकसान (Financial Loss) भी उठाना पड़ा है। आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि इन कृत्यों की प्रकृति ऐसी है कि प्रथम दृष्टया यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 सहित अन्य प्रासंगिक विधिक प्रावधानों के अंतर्गत दंडनीय अपराध बनते हैं।
आवेदन में यह महत्वपूर्ण बात भी कही गई है कि संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध लगाए गए आरोप किसी भी प्रकार से उनके वैध आधिकारिक कर्तव्यों के अंतर्गत नहीं आते, बल्कि यह कथित रूप से पद के दुरुपयोग (Abuse of Power), दुर्भावनापूर्ण (Mala Fide) आचरण तथा अवैध कार्यवाही के अंतर्गत आते हैं। इसी आधार पर संपादक ने महाराष्ट्र शासन से यह मांग की है कि संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति प्रदान की जाए, ताकि उनके खिलाफ विधि अनुसार आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ की जा सके।
इसके अतिरिक्त, आवेदन में यह भी अनुरोध किया गया है कि संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं प्रशासनिक कार्रवाई भी शुरू की जाए, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके और भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्यतः किसी लोक सेवक के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन चलाने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति (Sanction) आवश्यक होती है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि यदि आरोपित कृत्य आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर हों, या पद के दुरुपयोग, दुर्भावनापूर्ण अथवा अवैध आचरण के अंतर्गत आते हों, तो ऐसे मामलों में अभियोजन स्वीकृति का संरक्षण स्वतः लागू नहीं होता। इस प्रकार के मामलों में तथ्य और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
🗣️ प्रशासन की भूमिका और आगे की कार्यवाही:
अब यह मामला महाराष्ट्र शासन और संबंधित विभाग के समक्ष विचाराधीन है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन इस आवेदन पर क्या रुख अपनाता है और क्या संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति प्रदान की जाती है या नहीं। साथ ही, यह भी अपेक्षित है कि यदि आरोपों में प्रथम दृष्टया सत्यता पाई जाती है, तो मामले में निष्पक्ष जांच एवं आवश्यक विभागीय कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाएगी।
यह मामला न केवल एक समाचारपत्र को हुए कथित नुकसान का है, बल्कि यह सरकारी तंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन (Rule of Law) से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में समयबद्ध और निष्पक्ष निर्णय अत्यंत आवश्यक होता है, जिससे आम जनता का प्रशासनिक प्रणाली पर विश्वास बना रह सके।